एक नयी कविता
किसी ने कहा की वक्त नहीं
हर ख़ुशी है लोगों के दमन मै पर हसी के लिए वक़्त नहीं ...
दिन रात दौड़ती दुनिया में , ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं ...
माँ की लोरी का एहसास तो है ,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं ...
सारे रिश्तो को तो हम मार चुके ,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं ...
सारे नाम मोबाइल में हैं पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं ...
गैरो की क्या बात करें , जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं ...
आँखों मै है नींद बड़ी , पर सोने का वक़्त नहीं ...
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी , इस ज़िन्दगी का क्या होगा ,
की हर पल मरने वालों को , जीने के लिए भी वक़्त नहीं ...
मेरे द्वारा नही लिखी गयी हें
नवीन सी दुबे
No comments:
Post a Comment