Wednesday, November 24, 2010

वक़्त नहीं

एक नयी कविता
             किसी ने कहा  की वक्त नहीं
हर  ख़ुशी  है  लोगों  के   दमन  मै  पर  हसी  के   लिए  वक़्त  नहीं ...
दिन  रात  दौड़ती  दुनिया  में , ज़िन्दगी  के  लिए  ही  वक़्त  नहीं ...
माँ  की  लोरी  का  एहसास  तो   है ,
पर  माँ  को  माँ  कहने  का  वक़्त  नहीं ...
सारे  रिश्तो  को  तो  हम  मार  चुके ,
अब  उन्हें  दफ़नाने  का  भी  वक़्त  नहीं ...
सारे  नाम  मोबाइल   में  हैं  पर  दोस्ती   के लिए   वक़्त  नहीं ...
गैरो   की  क्या  बात  करें , जब  अपनों  के  लिए  ही  वक़्त  नहीं ...
आँखों  मै  है  नींद  बड़ी , पर  सोने  का  वक़्त  नहीं ...
तू  ही  बता  ऐ  ज़िन्दगी , इस  ज़िन्दगी  का  क्या  होगा ,
 की  हर  पल  मरने  वालों  को , जीने  के  लिए  भी  वक़्त  नहीं ...

मेरे द्वारा नही लिखी गयी हें
नवीन सी दुबे

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