प्रकृति
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें ||
सच मनो तो ना कभी सोती हें ||
हर पल हर समय की ये गवाह होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
समंदर की लहरों की चंचलता
आसमान के तारो की निश्चलता
आसमान के तारो की निश्चलता
पानी की बूंदों की पवित्रता
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
रावण का वध हो या कौरव की हार,
विक्रमादित्य का सिंगासन हो या
लक्ष्मीबाई की ललकार ,
केवट की नाव या सुदामा का प्यार .
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
भीषण बाढ हो या तपती चुभन
तबाही का भूकंप हो या बचाव का जतन
पतझड़ का आना हो या फूलो की सुगंध
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
मौसम का बदलाव हो या
ऋतुओ का आना जाना
तारो का टूटना हो,
या मोतियों का सिपों मे आना ,
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
बदलो की गर्जना ,
या नदियों का कलकल करता जल
कोयले की कालिख हो,
या हिमालय का श्वेत आँचल
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
ना पैदा होने की ख़ुशी हें इसको,
ना किसी के जाने का गम हें ,
राख या फूल चुन कर भी इसी मे प्रवाह की जाती हें
सीता जी भी तो शक्ति सहित इसी मे तो समाती हें |
इसका राज जानना मुश्किल हें जरा ,
क्योकि कुदरत के सारे राज यही तो छिपाती हें
सभी को अपने मे समेटे होती हें
ना कभी हंसती हें ना कभी रोती हें
नवीन सी दुबे
शाजापुर /देल्ली दिनांक ११ नवम्बर २०१०
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